यह वीडियो एसएपी एबीएपी और मटेरियल मैनेजमेंट (एमएम) मॉड्यूल के कॉन्फ़िगरेशन पर एक विस्तृत प्रशिक्षण है, जिसमें एंटरप्राइज स्ट्रक्चर, मटेरियल मास्टर, वेंडर मास्टर, प्राइसिंग, और पी2पी चक्र शामिल हैं।
एसएपी एबीएपी कोर्स सिलेबस और परामर्श ⏱ 0:00
•एसएपी एबीएपी कंसल्टेंट की भूमिका: क्लाइंट फेसिंग नहीं, फंक्शनल कंसल्टेंट क्लाइंट फेसिंग होते हैं।•एबीएपी कंसल्टेंट कस्टम टेबल, फील्ड्स, क्वेरीज और रिपोर्ट्स बनाते हैं।•एसएपी में कंपनी और कंपनी कोड आमतौर पर फाइनेंस कंसल्टेंट बनाता है, लेकिन कोर्स में खुद बनाना सिखाया जाता है।•कोर्स में एसएपी इंट्रोडक्शन, आर3 आर्किटेक्चर, लैंडस्केप, एएसएपी मेथडोलॉजी, ट्रांसपोर्ट रिक्वेस्ट, एमएम का इंटरप्राइज स्ट्रक्चर, मटेरियल मास्टर, वेंडर मास्टर, परचेस इन्फो रिकॉर्ड, पीओ कॉन्फ़िगरेशन (डॉक्यूमेंट टाइप, रिलीज़ स्ट्रेटजी, प्राइसिंग प्रोसीजर), एमएम-एफआई इंटीग्रेशन, पी2पी साइकिल, सबकॉन्ट्रैक्टिंग, वेंडर कंसाइनमेंट, स्टॉक ट्रांसफर, कॉन्ट्रैक्ट, शेड्यूल लाइन एग्रीमेंट, इनबाउंड डिलीवरी, थर्ड पार्टी ऑर्डर, सर्विस ऑर्डर शामिल हैं।•कोर्स में फाइनेंसियल ईयर, पोस्टिंग पीरियड, चार्ट ऑफ अकाउंट्स, अकाउंट ग्रुप्स, रिटेन अर्निंग अकाउंट भी सिखाए जाते हैं।एप्पल की रणनीति और कॉन्ट्रैक्टिंग ⏱ 20:01
•एप्पल ने टैरिफ से पहले 600 टन iPhone इंडिया से यूएस भेज दिए।•कॉन्ट्रैक्टिंग प्रक्रिया: वेंडर को ऑर्डर, वेंडर कंसाइनमेंट (माल हमारे पास, ओनरशिप वेंडर की), स्टॉक ट्रांसफर (इंट्रा/इंटर, STO)।•आउटलाइन एग्रीमेंट के दो हिस्से: कॉन्ट्रैक्ट और शेड्यूल एग्रीमेंट। इसके बिना P2P साइकिल प्रोसेस नहीं होती।एमआरपी, सीबीपी और रिज्यूम बिल्डिंग ⏱ 24:11
•एमआरपी (मटेरियल रिक्वायरमेंट प्लानिंग) और सीबीपी प्रोडक्शन और एमएम में महत्वपूर्ण; एमआरपी से सेफ्टी स्टॉक और ऑटोमैटिक पीओ बनता है।•उदाहरण: किसी कंपनी में एमआरपी न होने से सोल्डरिंग पेस खत्म होने पर 3-4 घंटे प्रोडक्शन रुका, लाखों का नुकसान।•रिज्यूम 2-3 पेज का होना चाहिए, स्ट्रांग पॉइंट्स बोल्ड करें। ट्रेनिंग मॉड्यूल क्लाइंट के हिसाब से अलग होते हैं; UAT और यूजर टेस्टिंग में फर्क है।क्लाइंट-विशिष्ट प्रशिक्षण और कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 40:02
•हर क्लाइंट का ट्रेनिंग मॉड्यूल थोड़ा अलग होता है, बेस सेम रहता है, पर कॉन्फ़िगरेशन डिफरेंट होती है।•मौजूदा मॉडल को कॉपी करके, नाम, प्लांट कोड, एड्रेस बदलकर नया मॉड्यूल जल्दी बनाया जाता है।•एंड-यूज़र्स को ट्रेनिंग दी जाती है कि पुराने सॉफ्टवेयर की गतिविधि SAP में कैसे करें।ट्रांज़ैक्शनल डेटा ट्रांसपोर्ट नहीं होता और सपोर्ट व्यवस्था ⏱ 43:03
•केवल कॉन्फ़िगरेशन/इम्प्लीमेंटेशन डेटा ट्रांसपोर्ट होता है; ट्रांज़ैक्शनल डेटा (जैसे PO, वेंडर, मास्टर) टेस्टिंग के बाद ट्रांसपोर्ट नहीं होता, क्लाइंट को खुद दोबारा बनाना पड़ता है।•अगर क्लाइंट सपोर्ट लेता है तो डायरेक्ट आगे बढ़ते हैं, नहीं तो उसे अपना SAP सैंडबॉक्स (डमी सॉफ्टवेयर) लेना पड़ता है; लाइव सिस्टम पर कभी चेंज नहीं करते।•सपोर्ट न लेने पर बड़ी कंपनियां (जैसे डाबर) थर्ड-पार्टी (जैसे एक्सेंचर) से सपोर्ट लेती हैं, जिसका खर्च 3-4 करोड़ रुपये सालाना होता है; खुद कंसल्टेंट हायर करना सस्ता पड़ सकता है।करियर सलाह और ट्रांसपोर्ट रिक्वेस्ट ⏱ 54:11
•छोटी कंपनी में लर्निंग बेहतर होती है क्योंकि वहां ज़्यादा काम करना पड़ता है; बड़ी प्रोडक्ट कंपनी में काम बंटा होता है, लेकिन सर्विस प्रोवाइडर (जैसे IBM, TCS) में अलग-अलग प्रोजेक्ट मिलते हैं, नई सीख और ट्रैवल का मौका मिलता है।•ट्रांसपोर्ट रिक्वेस्ट (TR) दो प्रकार की: कस्टमाइज़िंग रिक्वेस्ट (सामान्य कॉन्फ़िगरेशन) और वर्कबेंच रिक्वेस्ट (कस्टम डेवलप ऑब्जेक्ट); फ़ंक्शनल कंसल्टेंट भी कस्टमाइज़िंग रिक्वेस्ट का उपयोग करते हैं।•TR फ़ोल्डर बनाने के लिए IMG में ट्रांसपोर्ट ऑर्गनाइज़र खोलें; यूज़र के सारे फ़ोल्डर दिखते हैं।•एंड-टू-एंड इम्प्लीमेंटेशन का मतलब है किसी क्लाइंट के लिए पहली बार SAP का पूरा कॉन्फ़िगरेशन शुरू से अंत तक करना, जैसे कंपनी कोड बनाना; सिर्फ डेटा फिल करना नहीं।एंड-टू-एंड इम्प्लीमेंटेशन में फोल्डर और ट्रांसपोर्ट प्रक्रिया ⏱ 60:02
•प्रोजेक्ट के लिए एक क्लाइंट का एक फोल्डर बनाया जाता है, जिसमें उस क्लाइंट की सभी कॉन्फ़िगरेशन रहती है और केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं को एक्सेस होता है, ताकि परिवर्तन ट्रैक हो सकें और गलती पर कार्रवाई हो सके।•काम पूरा होने पर फोल्डर को रिलीज़ करके ट्रांसपोर्ट रिक्वेस्ट जनरेट की जाती है, लेकिन वास्तविक ट्रांसपोर्ट SAP बेसिस कंसल्टेंट करता है। रिलीज़ के बाद उस फोल्डर में अतिरिक्त परिवर्तन संभव नहीं होते।•इम्प्लीमेंटेशन के समय बार-बार नए फोल्डर बनाने की आवश्यकता नहीं है; सपोर्ट टिकटों का काम अलग-अलग फोल्डर में होना चाहिए, लेकिन यदि एक ही क्लाइंट के कई टिकट एक साथ हैं, तो सभी को एक फोल्डर में रख कर एक साथ ट्रांसपोर्ट करना चाहिए।SAP मेथोडोलॉजी और पार्टनर भूमिकाएँ ⏱ 73:23
•एस/4HANA टूल पद्धति है, जिसके पाँच फेज़ हैं: प्रोजेक्ट प्रिपरेशन, बिज़नेस ब्लूप्रिंट, रियलाइज़ेशन, फाइनल प्रिपरेशन, और गो-लाइव एंड सपोर्ट।•इम्प्लीमेंटेशन में भूमिकाएँ होती हैं: क्लाइंट (लाइसेंस खरीदता है), SAP (सर्विस प्रोवाइडर, लेकिन आमतौर पर इम्प्लीमेंटेशन पार्टनर करते हैं) और सर्विस प्रोवाइडर (ग्लोबल पार्टनर जैसे IBM, TCS, Infosys; और लोकल पार्टनर जैसे मावई, वृद्धि सॉफ्ट)।•SAP लाइसेंस किसी देश में पंजीकृत कंपनी से खरीदा जाता है, जैसे भारत में SAP इंडिया प्राइवेट लिमिटेड।एसएपी इंप्लीमेंटेशन प्रोजेक्ट प्रिपरेशन ⏱ 80:03
•वृद्धि सॉफ्ट मई इंफोटेक जैसी कंपनियां डोमेस्टिकली काम करती हैं, उनके क्लाइंट्स में बजाज मोटर्स, जीएनआईटी, इंडिया बुल्स, इंडियन कोस्टल गार्ड शामिल हैं।•बड़ी कंपनियों (आईबीएम, टीसीएस) के विपरीत, वृद्धि सॉफ्ट के पास इंटरनेशनल ऑफिस नहीं है, जिससे यूरोप जैसे क्षेत्रों में काम करना मुश्किल होता है, क्योंकि यूरोपीय संघ के नियमों के अनुसार काम यूरोपीय संघ के भीतर ही करना होता है।•प्रोजेक्ट प्रिपरेशन में क्लाइंट पर रिसर्च, टीम क्रिएशन, रिसोर्स बुकिंग, टीम ओरिएंटेशन शामिल हैं। बेंच स्ट्रेंथ जरूरी है; आईबीएम जैसी कंपनियां रिजर्व में 50-70 लोग रखती हैं।•क्लाइंट से 100% सपोर्ट लेना आवश्यक है, अन्यथा डेडलाइन मिस हो सकती है। हर फेज के बाद क्लाइंट से साइन-ऑफ लेना चाहिए ताकि बाद में विवाद न हो।एएसएपी प्रोजेक्ट में प्रारंभिक चरण और रिपोर्ट ⏱ 100:03
•बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस ओनर) क्लाइंट का पहला संपर्क बिंदु है, जो प्रोजेक्ट मैनेजर होता है और जिसने चार्ट पर हस्ताक्षर किए हैं।•क्लाइंट लोकेशन पर जाकर रिक्वायरमेंट ली जाती है, जिसके लिए क्लाइंट की टीम से दिन तय करना होता है; वहां प्रेजेंटेशन और अपेक्षाओं की चर्चा होती है।•रिक्वायरमेंट गैदर करने के बाद दो रिपोर्ट बनती हैं: AS-IS रिपोर्ट (वर्तमान बिजनेस रिक्वायरमेंट) और TO-BE रिपोर्ट (भविष्य में कैसे कॉन्फ़िगर होगा)।गैप एनालिसिस, बिजनेस ब्लूप्रिंट और SAP मेथोडोलॉजी ⏱ 106:10
•गैप एनालिसिस में क्लाइंट की जरूरतों और SAP के डिफ़ॉल्ट कार्यों के बीच अंतर देखा जाता है; जिन चीजों की कमी होती है, उन्हें कस्टम प्रोग्राम, स्क्रीन, रिपोर्ट आदि के रूप में बनवाया जाता है।•बिजनेस ब्लूप्रिंट पूरा दस्तावेज होता है जिसमें क्लाइंट की पूरी कॉन्फ़िगरेशन होती है, जिसे सभी कंसल्टेंट फॉलो करते हैं; इसे क्लाइंट से अप्रूवल लेने के बाद ही लागू किया जाता है।•ब्लूप्रिंट की अप्रूवल के बाद कंसल्टेंट काम शुरू करते हैं, फिर टेस्टिंग और गो-लाइव होता है; यह पूरी प्रक्रिया SAP मेथोडोलॉजी कहलाती है।क्लास शेड्यूल और अगला टॉपिक ⏱ 117:31
•अगली क्लास सोमवार को होगी, जिसमें MM मॉड्यूल का पहला टॉपिक 'एंटरप्राइज स्ट्रक्चर' पढ़ाया जाएगा; थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों कराया जाएगा क्योंकि एक क्लास कैंसिल हुई है।•सोहेल को क्लास के साथ-साथ अपने छोटे-छोटे कौशल सीखने की सलाह दी गई, और बताया गया कि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त क्लास भी हो सकती हैं।एंटरप्राइज स्ट्रक्चर और SAP मॉड्यूल ⏱ 120:14
•एंटरप्राइज स्ट्रक्चर पूरे संगठन की संरचना को संदर्भित करता है, जिसमें विभिन्न मॉड्यूल (FI/CO, MM, SD, HCM) के अपने-अपने ऑब्जेक्ट होते हैं, जैसे कंपनी, प्लांट, स्टोरेज लोकेशन, सेल्स एरिया आदि।•ब्लूप्रिंट में प्रत्येक मॉड्यूल अपने संबंधित ऑब्जेक्ट बनाता है, लेकिन कंपनी कोड सबसे ऊपर होता है और सभी के लिए अनिवार्य है।कंपनी और कंपनी कोड की परिभाषा ⏱ 128:38
•कंपनी (Company) एक कानूनी इकाई है जिसका अपना लाभ-हानि विवरण और बैलेंस शीट होता है; SAP लाइसेंस खरीदने वाले को क्लाइंट कहा जाता है।•उदाहरण: टाटा इन्फोसिस लाइसेंस खरीदता है, लेकिन टाटा मोटर्स के लिए इम्प्लीमेंटेशन करता है, तो टाटा इन्फोसिस क्लाइंट और टाटा मोटर्स कानूनी इकाई है।•एक क्लाइंट के कई कंपनी कोड हो सकते हैं जैसे कि एक अधिग्रहण (जैसे टाटा द्वारा जगुआर को खरीदना) या बहुराष्ट्रीय कंपनी के विभिन्न देशों में अलग-अलग कंपनी कोड।कंपनी कोड और क्लाइंट का निर्माण ⏱ 140:15
•कंपनी कोड (क्लाइंट) और लीगल एंटिटी (जिसके लिए इम्प्लीमेंटेशन होता है) अलग-अलग होते हैं। एक क्लाइंट के कई कंपनी कोड हो सकते हैं, लेकिन एक कंपनी कोड केवल एक ही क्लाइंट से असाइन किया जा सकता है।•कंपनी कोड बनाने के लिए T-कोड OX15, और लीगल एंटिटी के लिए T-कोड OX02 का उपयोग होता है। SPRO (SAP Reference IMG) में जाकर, डेफिनिशन्स -> फाइनेंशियल अकाउंटिंग -> डेफिन कंपनी कोड के पथ से भी यही काम किया जा सकता है। टी-कोड्स एसआईएमजी के अंतिम चार अंक होते हैं।•कंपनी बनाते समय नाम, पता, शहर, देश, मुद्रा (INR), भाषा (EN) जैसी जानकारी भरनी होती है। पोस्ट ऑफिस बॉक्स और सर्च टर्म (कॉमन सिस्टम बनाने के लिए) वैकल्पिक हैं।•कंपनी कोड को अपने कस्टमाइज़िंग फोल्डर (जैसे 'SOHEL ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज') में सेव करना चाहिए, और प्रोजेक्ट टीम के सदस्यों को एक्सेस देना चाहिए ताकि वे उस क्लाइंट के लिए काम कर सकें।कॉपी विकल्प और असाइनमेंट ⏱ 150:34
•कंपनी कोड क्रिएट करते समय 'कॉपी' विकल्प पूरी कंपनी की कॉन्फ़िगरेशन (जैसे फिस्कल ईयर, चार्ट ऑफ अकाउंट्स) को नई कंपनी में कॉपी कर देता है, जो नए लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके बजाय, 'न्यू एंट्री' से फ्रेश कंपनी बनाना बेहतर है, जहाँ हर सेटिंग (फिस्कल ईयर, पोस्टिंग पीरियड आदि) खुद से करनी पड़ती है।•कंपनी बनाने के बाद, उसे क्लाइंट के साथ असाइन करना आवश्यक है। यह असाइनमेंट T-कोड OX16 से होता है, या SPRO में डेफिनिशन्स -> असाइनमेंट्स -> फाइनेंशियल अकाउंटिंग के पथ से। क्लाइंट (जैसे SOHEL) को कई कंपनी कोड असाइन किए जा सकते हैं, लेकिन एक कंपनी कोड केवल एक ही क्लाइंट से असाइन हो सकता है।प्लांट और स्टोरेज लोकेशन की सेटिंग ⏱ 160:15
•प्लांट एक यूनिवर्सल ऑब्जेक्ट है जो लॉजिस्टिक्स के हर मॉड्यूल में होता है; कोड OX10 है, MM कंसलटेंट इसे बनाता है।•प्लांट बनाते समय फैक्ट्री कैलेंडर चुनना होता है; इंडिया के लिए SMP स्टैंडर्ड लिया जा सकता है।•दो प्लांट बनाए: SNOI (नोएडा) और SOH2 (ओखला); एड्रेस में कोड 24 (उत्तर प्रदेश) और 30 (दिल्ली) होते हैं।•स्टोरेज लोकेशन प्लांट के अंदर बनते हैं और स्वतः प्लांट से जुड़ते हैं; रॉ मटेरियल, सेमी फिनिश, फिनिश जैसी कैटेगरी बनाई जा सकती हैं।परचेस ऑर्गेनाइजेशन और निष्कर्ष ⏱ 177:00
•परचेस ऑर्गेनाइजेशन प्रोक्योरमेंट एक्टिविटीज के लिए जिम्मेदार होता है; इसे प्लांट के हिसाब से बनाया जा सकता है।•नोएडा के लिए परचेस ऑर्गेनाइजेशन बनाया गया (कोड SOA3); ओखला के लिए अलग से बनाना है।•मल्टीपल एड्रेस फीचर से स्टोरेज लोकेशन के लिए अलग-अलग एड्रेस (जैसे चेन्नई, मुंबई) डाल सकते हैं।•अगले सत्र में आगे की सेटिंग्स होंगी; डॉक्यूमेंट शेयर किया गया है।परचेसिंग ग्रुप और असाइनमेंट ⏱ 180:29
•परचेसिंग ग्रुप एक स्वतंत्र इकाई है, जिसे असाइन नहीं किया जाता, बल्कि सामग्री, वेंडर या खरीद रिकॉर्ड बनाते समय असाइन किया जाता है।•दो परचेसिंग ग्रुप बनाए: सोहेल और दूसरा। टेलीफोन नंबर दर्ज किए। (कीवर्ड OMME)•असाइनमेंट अनुभाग में, पहले परचेस ऑर्गनाइज़ेशन को कंपनी कोड (T-code OX01) के साथ असाइन किया, फिर प्लांट (T-code OX02) के साथ।•फिर स्टैंडर्ड परचेस ऑर्गनाइज़ेशन असाइन करें (T-code OX7) — यह एक-दूसरे की ओर से खरीद की अनुमति देता है।•रेफरेंस परचेस ऑर्गनाइज़ेशन (T-code OMKJ) भी बनाया, जिससे एक PO दूसरे से शर्तें और मूल्य संदर्भ ले सके।फिस्कल ईयर और उसका महत्व ⏱ 190:47
•फिस्कल ईयर एक वित्तीय वर्ष है, कैलेंडर नहीं; हर देश का अलग होता है (भारत में अप्रैल-मार्च)।•फिस्कल ईयर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करता है कि कौन सा पीरियड सक्रिय है; उदाहरण: 24 अप्रैल की तारीख के लिए पीरियड 1 होगा, न कि 4।•SAP में फिस्कल ईयर पहले से मौजूद हैं: K4 (जनवरी-दिसंबर), V3 (अप्रैल-मार्च), V6 (जुलाई-जून), VN (अक्टूबर-सितंबर)।•हमेशा स्टैंडर्ड डेटा का उपयोग न करें; उसे कॉपी करके अपना खुद का बनाएं, क्योंकि गलती करने पर आप स्टैंडर्ड डेटा को खराब कर सकते हैं।•फिस्कल ईयर बनाना जरूरी है क्योंकि कंपनी को कोई फिस्कल ईयर असाइन नहीं है; SAP डमी कंपनी के लिए स्टैंडर्ड देता है।फिस्कल ईयर और पोस्टिंग पीरियड्स की अवधारणा ⏱ 200:29
•फिस्कल ईयर बनाते समय तीन विकल्प होते हैं: कैलेंडर डिपेंडेंट, ईयर डिपेंडेंट, और शॉर्ट फिस्कल ईयर।•कैलेंडर डिपेंडेंट तब चुनें जब फिस्कल ईयर जनवरी से दिसंबर और अनलिमिटेड समय का हो।•ईयर डिपेंडेंट तब चुनें जब फिस्कल ईयर लिमिटेड समय का हो, जैसे सिर्फ एक साल के लिए।•अन्य किसी भी फिस्कल ईयर के लिए (जैसे अप्रैल से मार्च) इन दोनों विकल्पों में से कोई नहीं चुनना चाहिए, बल्कि कस्टम बनाना होता है।•शॉर्ट फिस्कल ईयर छोटी अवधि के लिए होता है, जैसे जब कंपनी अक्टूबर में रजिस्टर्ड हो और पहला वित्तीय वर्ष अक्टूबर से मार्च तक छह महीने का हो।फिस्कल ईयर बनाने की प्रक्रिया और पोस्टिंग पीरियड्स ⏱ 207:17
•फिस्कल ईयर T-कोड OB20 और OB29 से मेंटेन किया जाता है।•कोड अल्फ़ान्यूमेरिक होने चाहिए, स्पेशल कैरेक्टर नहीं।•फिस्कल ईयर बनाते समय 12 पोस्टिंग पीरियड्स होते हैं, प्रत्येक महीने के लिए एक, और स्पेशल पोस्टिंग पीरियड्स अधिकतम 4 होते हैं।•स्पेशल पोस्टिंग पीरियड्स ऑडिट उद्देश्यों के लिए उपयोगी होते हैं, जैसे देर से की गई एंट्रीज़ को ट्रैक करना।•कैलेंडर डिपेंडेंट फिस्कल ईयर के लिए पोस्टिंग पीरियड्स ऑटोमैटिक रूप से बन जाते हैं, जबकि अन्य के लिए मैन्युअल रूप से महीने और दिन सेट करने होते हैं, और वर्ष को -1 से समायोजित करना होता है।वित्तीय वर्ष और पोस्टिंग अवधि की स्थापना ⏱ 220:31
•जुलाई से छह महीने का वित्तीय वर्ष बनाया गया, अगले वर्ष के लिए -1 किया गया, बाद में अप्रैल से मार्च (4M) का वित्तीय वर्ष चुना गया।•शॉर्ट एंड के लिए फिस्कल ईयर वेरिएंट में 2025 के लिए छह महीने का विशेष पीरियड और एक सामान्य पीरियड बनाया गया।•कंपनी कोड SOH वन को असाइन किया गया, 4M (अप्रैल-मार्च) वेरिएंट का उपयोग किया गया।•12 पोस्टिंग पीरियड बनाए गए, उन्हें खोलने के लिए OB52 में पोस्टिंग पीरियड वेरिएंट बनाया गया, जिसमें 1 से 12 (2025) और 13 से 16 तक के विशेष पीरियड शामिल किए गए।फील्ड स्टेटस वेरिएंट की तैयारी ⏱ 232:01
•फील्ड स्टेटस वेरिएंट की अवधारणा समझाई गई, जो यह निर्धारित करता है कि GL में कौन-कौन सी फ़ील्ड अनिवार्य, वैकल्पिक, केवल दिखाने योग्य या छिपी होनी चाहिए।•OB C4 टी-कोड का उपयोग करके फील्ड स्टेटस वेरिएंट की कॉपी की गई, मानक SAP वेरिएंट से SOH वन नामक वेरिएंट बनाया गया, और इसे कंपनी कोड को असाइन करने के लिए OB C5 का उपयोग किया गया।•बच्चों द्वारा बनाए गए गलत वेरिएंट (जैसे 24 के बजाय 25 पीरियड) पर चर्चा की गई, जिससे विशेष पोस्टिंग पीरियड काम नहीं करेंगे।चार्ट ऑफ अकाउंट्स की परिभाषा और सेटअप ⏱ 240:31
•चार्ट ऑफ अकाउंट्स (खाता बुक) फाइनेंस कॉन्फ़िगरेशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिस पर पूरा फाइनेंस निर्भर करता है।•जीएल अकाउंट (जनरल लेजर अकाउंट) का उपयोग दैनिक लेनदेन रिकॉर्ड करने के लिए होता है; लेजर अकाउंट स्वचालित होता है।•चार्ट ऑफ अकाउंट्स को परिभाषित करने के लिए टी-कोड OB13 का उपयोग किया जाता है, और इसे कंपनी कोड को असाइन करना आवश्यक है।•चार्ट ऑफ अकाउंट्स की लंबाई (जीएल अकाउंट नंबर) आमतौर पर 4 या 8 अंकों की होती है; अधिकतम 10 अंक तक संभव है।हाना बनाम ECC में अंतर और डेटा प्रबंधन ⏱ 240:31
•ECC में फाइनेंस (FI) और कंट्रोलिंग (CO) के लिए जीएल अकाउंट अलग-अलग होते हैं, जबकि हाना में कंट्रोलिंग के लिए अलग जीएल बनाने पड़ते हैं।•हाना में OB13 की नई एंट्री में 'इंटीग्रेशन कंट्रोलिंग' का विकल्प नहीं होता, जबकि ECC में मैनुअल/ऑटोमैटिक कॉस्ट एलिमेंट क्रिएशन का विकल्प होता है।•फाइनेंस में रिकॉर्ड-टू-रिपोर्ट (R2R) प्रक्रिया होती है; डेटा डिलीट करने के बजाय 'ऑब्सोलेट ब्लॉक' का उपयोग किया जाता है ताकि भविष्य में उपयोग न हो सके।•कंसोलिडेशन के लिए ग्रुप चार्ट ऑफ अकाउंट्स का उपयोग किया जा सकता है, जिससे कई कंपनियों की रिपोर्ट एक साथ निकाली जा सकती है।यात्रा और सांस्कृतिक अन्वेषण ⏱ 260:33
•सिंगापुर की साइड को भी गए थे, अगली बार शडी आएंगे तो पुणे और गोवा साइड घूमेंगे, जहां शिवलिंग (ज्योतिर्लिंग) है।•पुणे-मुंबई साइड घूमने के लिए नवंबर-दिसंबर का समय अच्छा है, वहां कम गर्मी होती है।•मुंबई दिल्ली जैसा लगा, पसंद नहीं आया; असली अनुभव महाराष्ट्र के गांवों में जाकर संस्कृति, खाना आदि देखने में है।•धुले (Dhule) गुजरात और मध्य प्रदेश जाने के मार्ग का केंद्रीय पॉइंट है; NH 3 और NH 6 से जुड़ा है। मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेसवे बनने से पुराने हाईवे पर ट्रैफिक कम होगा।SAP FICO कॉन्फ़िगरेशन (चार्ट ऑफ अकाउंट्स और GL) ⏱ 260:33
•चार्ट ऑफ अकाउंट्स (OB62) को असाइन किया गया; कंपनी कोड SOA1 के लिए।•कंट्री स्पेसिफिक चार्ट ऑफ अकाउंट्स का महत्व: टैक्स, कस्टम ड्यूटी आदि अलग-अलग देशों में अलग रिकॉर्ड होते हैं।•डिफाइन अकाउंट ग्रुप्स (OBD3) में GL की श्रेणियां बनाईं: एसेट्स (4-5 लाख), बैंक, कैश, एक्सपेंसेस, लायबिलिटीज, रेवेन्यू, टैक्स, वेंडर, कस्टमर, करंट एसेट। GL नंबर 8 डिजिट का है, अधिकतम 10 डिजिट हो सकता है, लेकिन लंबाई बढ़ाई जा सकती है।•FS00 में GL बनाते समय दो प्रकार: बैलेंस शीट अकाउंट (बैलेंस कैरी फॉरवर्ड) और P&L स्टेटमेंट अकाउंट (बैलेंस मेन अकाउंट में जाता है)। रिटेन अर्निंग अकाउंट (OB53) को P&L GL के लिए सेट किया गया।•एनवायरनमेंट सेटिंग्स में "Display Account Information Tree" टिक करके GL ट्री देखा जा सकता है।मटेरियल मास्टर कॉन्फ़िगरेशन का सारांश ⏱ 281:16
•एंड यूज़र मटेरियल क्रिएट करने के लिए टी-कोड MM01, MM02, MM03 का उपयोग करता है, लेकिन कॉन्फ़िगरेशन के बाद ही।•मटेरियल बनाते समय चार मुख्य व्यूज़ भरने होते हैं: अकाउंटिंग, जनरल प्लांट डेटा, परचेसिंग, और बेसिक डेटा; अन्य व्यूज़ भी होते हैं।•मटेरियल को दूसरे प्लांट के लिए विस्तारित (extend) करने के लिए MM01 में नंबर डालकर नए व्यूज़ जोड़े जाते हैं, कॉपी नहीं की जाती; कॉपी केवल दूसरे कंपनी कोड में मटेरियल बनाने के लिए होती है।•फ़ील्ड ग्रुपिंग के लिए OMSR और OMSN टी-कोड्स का उपयोग होता है; इनमें फ़ील्ड्स को ग्रुप करके रिक्वायर्ड, हाइड, या डिस्प्ले-ओनली बनाया जाता है।मटेरियल टाइप बनाना और फील्ड रेफरेंस ⏱ 301:16
•फील्ड रेफरेंस (SOH1) बनाकर फील्ड्स को रिक्वायर्ड, डिस्प्ले ओनली या हाइड किया जा सकता है।•मटेरियल टाइप बनाने के लिए T-code OMS2 का उपयोग होता है, रॉ मटेरियल (ROH) से कॉपी करके SOH1 असाइन किया जाता है।•XPlant Material Status 40 का मतलब रिलीज़ है, 01 ब्लॉक फॉर प्रोक्योरमेंट, 499 ऑब्सोल्यूट; आइटम कैटेगरी ग्रुप रिपोर्टिंग के लिए है।•एक्सटर्नल नंबर असाइनमेंट विदाउट चेक गलत है, इसे अनटिक करें; क्वांटिटी अपडेटिंग और वैल्यू अपडेटिंग प्लांट के लिए ऑन करना जरूरी है, नहीं तो PO नहीं बनेगा।मटेरियल मास्टर कॉन्फ़िगरेशन का सारांश ⏱ 321:19
•नंबर रेंज: पहले नंबर रेंज बनाई जाती है (जैसे 10001 से 199 तक), जिसमें इंटरनल और एक्सटर्नल विकल्प होते हैं। इंटरनल में सिस्टम अपने आप नंबर देता है, एक्सटर्नल में मैन्युअली नंबर दिया जाता है।•मटेरियल टाइप: मटेरियल टाइप (जैसे रॉ मटेरियल, सेमी-फिनिश्ड, फिनिश्ड) बनाने के लिए कॉपी करके नया बनाया जाता है।•इंडस्ट्री सेक्टर: इंडस्ट्री टाइप (जैसे ऑटोमोबाइल) बनाना होता है, जिसमें सिंगल डिजिट कोड होते हैं।•मटेरियल ग्रुप: मटेरियल की कैटेगरी (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, स्पेयर पार्ट्स) बनाना होता है, जो रिपोर्टिंग के काम आता है।•फील्ड सेक्शन: फील्ड्स को ग्रुप करके (जैसे बेस यूनिट, मटेरियल ग्रुप) आवश्यक फील्ड्स को मैंडेटरी बनाया जाता है।मटेरियल टाइप और नंबर रेंज कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 341:20
•प्लांट के लिए मटेरियल टाइप ऑन करना: क्वांटिटी/वैल्यू अपडेटिंग को प्लांट्स के लिए सक्षम करना; अन्यथा सिस्टम मटेरियल को वैल्यूएशन एरिया मानता है।•पाइपलाइन कॉन्फ़िगरेशन: आरओए से कॉपी करने पर सभी प्लांट पाइपलाइन के लिए ऑन दिखते हैं, लेकिन नए मटेरियल टाइप बनाने पर केवल चयनित प्लांट ही ऑन रहते हैं।•नंबर रेंज: एमएमएआर में मौजूदा रेंज (5300-5399) को कॉपी करके नई रेंज 2000 तक सीमित की, A1 के लिए रेंज 1-2000 बनाई, इंटरनल असाइनमेंट के लिए टिक नहीं किया।•रेंज को असाइन एलिमेंट ग्रुप में सोहेल मोटर्स मटेरियल टाइप से असाइन किया।इंडस्ट्री टाइप, मटेरियल ग्रुप और कंपनी कोड सेटिंग्स ⏱ 341:20
•इंडस्ट्री टाइप: सोहेल इंडस्ट्रीज़ बनाया, फील्ड रेफरेंस (एसओए) असाइन किया।•मटेरियल ग्रुप: SOH1, SOH2, SOH3 बनाए; कई ग्रुप बना सकते हैं (जैसे इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल्स, नॉर्मल व्हीकल्स, स्पेयर पार्ट्स डोमेस्टिक/इंपोर्ट)।•कंपनी कोड: ओएमएसवी में SOH1 के लिए 2025, पीरियड 2 (मई) सेट किया।•एबीपी (अलव पोस्टिंग टू प्रीवियस पीरियड) एक पीरियड पिछले में एंट्री की अनुमति देता है; डीबीपी (डिसअलाउ बैक कॉस्टिंग आफ्टर चेंज ऑफ पीरियड) पीरियड बदलने के बाद पिछले में एंट्री नहीं देता।•एमएम व्यू: मटेरियल लेजर, प्राइसिंग कंट्रोल कंट्रोल मैंडेटरी हाना में, ईसीसी में नहीं।मटेरियल क्रिएशन और व्यू सेलेक्शन ⏱ 341:20
•एमएम01 में सोहेल मटेरियल टाइप चुना; डिफ़ॉल्ट व्यू (बेसिक डेटा, खरीद, आदि) दिखे, सेल्स नहीं दिखा क्योंकि डिसेलेक्ट था; एमएस02 में सेल्स व्यू ऑन करके फिर एमएम01 में सेल्स आ गया।•मटेरियल बनाते समय मैंडेटरी फील्ड: ओल्ड मटेरियल नंबर, मटेरियल ग्रुप, ग्रॉस वेट, डिस्क्रिप्शन; अतिरिक्त फील्ड (जैसे डिवीजन, प्रोडक्ट हायरार्की) सेल्स से संबंधित, हमारी नहीं।•खरीद व्यू: ऑर्डर यूनिट डज़न (12) लिया, परचेसिंग ग्रुप सोहेल, टैक्सेबल, बैच प्रबंधित (बैचमैन) टिक, ऑटोमैटिक पीओ ऑन किया।•रिमाइंडर: 10, 20, 30 दिनों के रिमाइंडर सेट; कोटा अरेंजमेंट और सोर्स लिस्ट बाद के टॉपिक हैं।कोटा अरेंजमेंट, जेआईटी शेड्यूल और मटेरियल मास्टर ⏱ 361:21
•कोटा अरेंजमेंट: 100% मंगाने के लिए 20% एक वेंडर से, 40% दूसरे से, 40% तीसरे से।•जेआईटी (जस्ट इन टाइम) शेड्यूल इंडिकेटर: वेंडर से सिंक्रोनाइज़ेशन आवश्यक, ताकि स्टॉक कम जगह में भी प्रोडक्शन न रुके।•मटेरियल मास्टर में पार्ट नंबर, मैन्युफैक्चरर (जैसे हरमन) और वेयरहाउस कॉन्फ़िगरेशन: तापमान 20-30 डिग्री, कंटेनर रिक्वायरमेंट, पिकिंग एरिया, स्टोरेज कंडीशन, मैक्सिमम स्टोरेज पीरियड 365 दिन।•अकाउंटिंग: वैल्यूएशन क्लास 3000, प्राइस 30000 प्रति पीस।वेंडर मास्टर कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 362:53
•वेंडर अकाउंट ग्रुप परिभाषित करें (ट्रांजैक्शन कोड OBD3); वेंडर प्रकार: घरेलू, आयात, वन-टाइम, रसायन, सरकारी।•वन-टाइम वेंडर: केवल एक बार ऑर्डर; दोबारा ऑर्डर हेतु पुनः निर्माण आवश्यक।•वेंडर चयन में गुणवत्ता और निरंतरता मायने रखती है, जैसे iPhone में स्क्रीन के लिए Samsung, LG, आदि।वेंडर डेटा और पेमेंट टर्म्स ⏱ 381:22
•वेंडर का तीन प्रकार का डेटा होता है: जनरल डेटा, फाइनेंस डेटा (कंपनी कोड के साथ) और प्रोक्योरमेंट डेटा।•विदहोल्डिंग टैक्स टीडीएस से अलग है; विदहोल्डिंग में वेंडर को भुगतान करते समय टैक्स रोककर रखा जाता है, जबकि टीडीएस में कंपनी कर्मचारी की ओर से टैक्स काटकर सरकार को जमा करती है।•डनिंग प्रोसीजर का उपयोग सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन में किया जाता है, जिसमें भुगतान न करने पर रिमाइंडर भेजे जाते हैं; यहाँ बताया गया कि पहला रिमाइंडर, फिर 5 दिन बाद दूसरा रिमाइंडर, और बाद में ब्याज जोड़ा जा सकता है।•वन टाइम वेंडर बनाने के लिए स्क्रीन पर टिक मार्क करना होता है, जो सिस्टम में उसे वन टाइम वेंडर बना देता है।पेमेंट टर्म्स और इंस्टॉलमेंट पेमेंट ⏱ 389:07
•पेमेंट टर्म्स में 30 दिन, 45 दिन आदि शामिल होते हैं; बेस लाइन डेट के विकल्प में डॉक्यूमेंट डेट, पोस्टिंग डेट और एंट्री डेट होते हैं, जिनसे पेमेंट की गिनती शुरू होती है।•पेमेंट मेथड में देश अनुसार चयन करना होता है, जैसे बैंक ट्रांसफर, चेक; यदि केवल एक मेथड चुना जाता है तो केवल उसी से भुगतान संभव होता है।•इंस्टॉलमेंट पेमेंट के लिए टिक मार्क करने पर 30 दिन की अवधि और डिस्काउंट फ़ील्ड अक्षम हो जाते हैं; इंस्टॉलमेंट में भुगतान किश्तों में किया जाता है।•कैश डिस्काउंट का उदाहरण: 10 दिनों के भीतर भुगतान पर 0.50% डिस्काउंट, 20 दिनों में 0.25% डिस्काउंट, और 30 दिनों में नेट भुगतान।वेंडर मास्टर कॉन्फ़िगरेशन और प्रैक्टिकल ⏱ 401:23
•एक्स्ट्रा कीबोर्ड में S बटन खराब होने के कारण लैपटॉप कीबोर्ड से काम चलाया गया।•इंस्टॉलमेंट क्रिएशन: 30%, 40%, 30% के तीन इंस्टॉलमेंट बनाए गए, असाइन की गई 'बिना डेज वाली' विदाउट डेज इंस्टॉलमेंट, और एक मेन इंस्टॉलमेंट असाइन की गई।•डिफाइन वेंडर रिकंसिलेशन (FSC0) में GL बनाकर वेंडर/सप्लायर असाइन किया गया। कंट्रोल डेटा में रिकंसिलेशन अकाउंट (वेंडर) और सॉर्टिंग 012 (वेंडर नंबर) सेट किया गया।•वेंडर क्रिएशन टी-कोड: XK01, MK01, FK01। हाना (S/4HANA) में ये बंद हैं, केवल BP (बिजनेस पार्टनर) टी-कोड है, जहां वेंडर को सप्लायर कहा जाता है।•आगे की क्लास में वेंडर क्रिएशन प्रैक्टिकल और SD मॉड्यूल की पेमेंट प्रक्रिया (फीस 25 vs 22) पर चर्चा होगी।•अकाउंट ग्रुप कॉन्फ़िगरेशन: SOH1 (डोमेस्टिक वेंडर) और SOH2 (वन टाइम वेंडर) बनाए गए। SOH2 में 'स्किप एड्रेस चेक' का चयन किया गया, जो हाना में डिफ़ॉल्ट रूप से टिक रहता है।•हाना में वर्जन-डिपेंडेंट नाम बदलाव: 2020 जून/अगस्त अपडेट के बाद वेंडर को सप्लायर कहा जाने लगा।वेंडर मास्टर डेटा और नंबर रेंज ⏱ 421:23
•वेंडर मास्टर डेटा में तीन विकल्प होते हैं: अकाउंटिंग (FK01/FK02/FK03), परचेसिंग (MK01/MK02/MK03), और सेंट्रली (XK01/XK02/XK03) जो दोनों डेटा को एक साथ भरने की अनुमति देता है।•XK01 का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यह फाइनेंस और प्रोक्योरमेंट दोनों का डेटा भरता है; अन्य टी-कोड अब HANA में बंद (ऑब्सोल्यूट) हो चुके हैं, वहां केवल BP (बिजनेस पार्टनर) टी-कोड चलता है।•नंबर रेंज इंटरवल (एक्सएन01) में दो रेंज बनाई गईं: 0H (10001 से) और 0I (10001 से) वेंडर टाइप्स के लिए, और फिर असाइन नंबर टू वेंडर अकाउंट ग्रुप्स (एक्सएन07) में असाइन की गईं।पेमेंट टर्म्स, जीएल अकाउंट और रिकंसिलेशन ⏱ 431:06
•पेमेंट टर्म्स (OBB8) में SO1 बनाया गया: 30 दिनों की डे लिमिट, 0.5% डिस्काउंट 10 दिनों में, 0% 20 दिनों में, और 0% 30 दिनों में। इंस्टॉलमेंट पेमेंट (SO2) भी बनाया गया, जहां 60%, 20%, और 20% के तीन इंस्टॉलमेंट हैं।•जीएल अकाउंट (FS00) में वेंडर बैलेंस शीट अकाउंट के लिए "डोमेस्टिक रिकंसिलेशन अकाउंट" बनाया गया।•चार्ट ऑफ अकाउंट (OBD4) से वेंडर नंबर लेकर GL बनाया गया; क्रिएट बैंक इंटरेस्ट में 0/67 कोड का उल्लेख किया गया, हालांकि HANA में भी वही कार्य करता है।वेंडर मास्टर और डॉक्यूमेंट टाइप कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 441:25
•वेंडर क्रिएशन के लिए XK01 का उपयोग करें, जिसमें कंपनी कोड और परचेस ऑर्गनाइजेशन डेटा दोनों शामिल होते हैं; इसमें परचेसिंग ग्रुप (SOA2-SOA3) और अकाउंट ग्रुप (SOA1) भरा जाता है।•वेंडर एड्रेस में कंपनी का नाम (MRF Tyres India Pvt Ltd) और पता (A-67, Okhla Industrial, Noida, UP 201301) दर्ज किया जाता है। रिकंसिलेशन अकाउंट सेक्शन में विदहोल्डिंग टैक्स, पेमेंट टर्म्स (SOH1), पेमेंट मेथड, और पेमेंट ब्लॉक जैसे फाइनेंस विकल्प भरे जाते हैं।•आरएमए (RMA) इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स में वारंटी की गणना मैन्युफैक्चरिंग डेट से करता है; यदि बिल और मैन्युफैक्चरिंग डेट में 3 महीने से अधिक का अंतर है, तो वारंटी मैन्युफैक्चरिंग डेट से शुरू होती है।•डॉक्यूमेंट टाइप कॉन्फ़िगरेशन में, SAP के स्टैंडर्ड डॉक्यूमेंट (जैसे NB) को कॉपी करके अपना खुद का डॉक्यूमेंट टाइप बनाना चाहिए, जैसे 'SOL परचेस रिक्विजिशन डॉक टाइप'। इसमें आइटम कैटेगरी, नंबर रेंज, और फील्ड अनिवार्यता (मैंडेटरी) को अनुकूलित किया जा सकता है।आइटम इंटरवल और नंबर रेंज ⏱ 461:26
•आइटम इंटरवल का उद्देश्य: आइटम के बीच अंतर निर्धारित करना; SAP डिफ़ॉल्ट 10 है, लेकिन इसे बदला जा सकता है (जैसे 1, 2, 5)।•नंबर रेंज: एक दस्तावेज़ प्रकार को दो रेंज (आंतरिक और बाहरी) असाइन की जा सकती हैं; बाहरी रेंज डेटा माइग्रेशन (LSMW, बैच इनपुट) के लिए उपयोगी है।दस्तावेज़ प्रकार विन्यास और लिंकिंग ⏱ 461:57
•दस्तावेज़ प्रकार कॉपी करते समय SAP स्टैंडर्ड (जैसे NB) से कॉपी करना बेहतर है, क्योंकि यह सभी संबंधित दस्तावेज़ों (जैसे खरीद अनुरोध, खरीद आदेश, अनुबंध) के बीच स्वचालित लिंकिंग सुनिश्चित करता है।•न्यू एंट्री से बनाने पर लिंकिंग नहीं होती, जिससे दस्तावेज़ एक-दूसरे से कनेक्ट नहीं होते और कार्यक्षमता प्रभावित होती है।•स्क्रीन लेआउट: फ़ील्ड को अनिवार्य, वैकल्पिक या प्रदर्शन योग्य बनाया जा सकता है; रिलीज़ रणनीति के लिए ओवरऑल रिलीज़ विकल्प महत्वपूर्ण है।कॉन्ट्रैक्ट प्रकार और स्टॉक ट्रांसफर ⏱ 481:28
•क्वांटिटी कॉन्ट्रैक्ट: निश्चित मात्रा के लिए, वैल्यू कॉन्ट्रैक्ट: निश्चित मूल्य के लिए, जिसमें अलग-अलग सामान शामिल हो सकते हैं।•स्टॉक ट्रांसफर मैंडेटरी है (आंतरिक प्लांट ट्रांसफर के लिए), और सभी ऑर्डर प्रकारों (कॉन्ट्रैक्ट, कोटेशन, शेड्यूल एग्रीमेंट) के लिए समान विकल्प: नंबर रेंज, डॉक्यूमेंट टाइप, स्क्रीन लेआउट, टॉलरेंस लिमिट, अकाइविंग।रिलीज़ स्ट्रेटजी और फिजिकल इन्वेंटरी ⏱ 485:09
•रिलीज़ स्ट्रेटजी: अप्रूवल के लिए पैरामीटर (जैसे डॉक्यूमेंट टाइप, वैल्यू, परचेस ग्रुप, प्लांट, स्टोरेज लोकेशन) पर आधारित; डॉक्यूमेंट टाइप, वैल्यू, परचेस ग्रुप सबसे सामान्य हैं।•उदाहरण: एक कंपनी में 3 करोड़ का स्टॉक होने के बावजूद पीओ बनाया गया, बाद में फिजिकल इन्वेंटरी से पता चला कि स्टॉक नहीं है; यह फ्रॉड का कारण बन सकता है।•फिजिकल इन्वेंटरी: सिस्टम में दिख रहे स्टॉक की वास्तविक उपलब्धता की जाँच; साइक्लिक और पीरियडिक तरीके से होती है; लीकेज (खराब सामान) के लिए क्रेडिट मेमो बनाया जाता है।•पैरामीटर डिफाइन करने के लिए टेबल: सेबान (EBAN) परचेस रिक्विजिशन के लिए, सेको (EKPO) परचेस ऑर्डर के लिए; टी-कोड CT04; वैल्यू के लिए फील्ड नेम: BSART (डॉक्यूमेंट टाइप), वैल्यू के लिए GSWRT (रिक्विजिशन) और GNETW (पीओ)।पैरामीटर निर्माण और रिलीज़ स्ट्रैटेजी सेटअप ⏱ 501:29
•डॉक्यूमेंट टाइप, वैल्यू और परचेस ग्रुप जैसे पैरामीटर बनाए जाते हैं। मल्टीपल वैल्यू चुनने का लाभ है कि रिलीज़ स्ट्रैटेजी में कई डॉक्यूमेंट टाइप या वैल्यू चुन सकते हैं, जबकि सिंगल वैल्यू से केवल एक ही चुन पाएंगे।•डॉक्यूमेंट टाइप के लिए मल्टीपल वैल्यू चुनी गई। वैल्यू पैरामीटर में अमाउंट (10,000, 1 लाख, 5 लाख) और परचेस ग्रुप में SO H, संकेत, स्काई आदि डाले।•CL02 टी-कोड से क्लास बनाई जाती है। रिलीज़ स्ट्रैटेजी के लिए 032 (बैच मैनेजमेंट के लिए 023) क्लास प्रकार चुना जाता है।•रिलीज़ ग्रुप S1 बनाया गया (ओवरऑल वाला), रिलीज़ कोड A1 से A5 (परचेस हेड, असिस्टेंट मैनेजर, सुपरवाइज़र, एग्ज़ीक्यूटिव) बनाए गए। रिलीज़ इंडिकेटर डिफ़ॉल्ट (ब्लॉक/रिलीज़) होते हैं, बनाने की आवश्यकता नहीं।रिलीज़ स्ट्रेटजी और वर्कफ्लो सेटअप (सारांश) ⏱ 521:29
•पहली रिलीज़ स्ट्रेटजी बनाई गई: ऑर्डर 1 लाख तक, तीन निर्दिष्ट पदों (A1, A2, A3) में से किसी के परचेस करने पर ट्रिगर होगी।•दूसरी रिलीज़ स्ट्रेटजी: ऑर्डर 5 लाख तक, A1, A2, A3, A4 का अप्रूवल आवश्यक; परचेस ऐड, परचेस मैनेजर, एस मैनेजर के पोल आने पर डॉक्यूमेंट ऑटोमैटिक रिलीज़ होगा।•अप्रूवल के लिए पोजीशन (जॉब पोजीशन) का उपयोग बेहतर है; परीक्षण के लिए यूज़र आईडी (जैसे SOG हर्षित) का उपयोग किया गया। प्लांट के अनुसार अप्रूवल पोजीशन बदलती है।•S/4HANA (SPMM) में रिलीज़ स्ट्रेटजी बनाने की प्रक्रिया समझाई गई।इंटरनेट, वाई-फाई और अन्य चर्चा ⏱ 532:41
•सर्वर धीमा होने पर चर्चा: फोन की जगह वाई-फाई बेहतर है; ज़ूम के लिए 4-5 MB स्पीड पर्याप्त है, पर अन्य सॉफ्टवेयर (जैसे Microsoft टीम) अधिक डेटा लेते हैं।•वाई-फाई प्लान: ₹500 + ₹88 टैक्स = ₹588/माह, 40 MB स्पीड, Airtel फाइबर से एक फ्री नंबर मिलता है। DTH हटाकर ओटीटी सब्सक्रिप्शन (Amazon प्राइम, Netflix ₹2400/साल, आदि) से पैसे बचाए।•Airtel बनाम Jio: क्षेत्र के अनुसार कनेक्टिविटी बदलती है; स्पीड और इंटरनेट प्रोवाइडर के अनुभव साझा किए।•आईजीसी (IGC) कोड सर्वर पर बदलता रहता है क्योंकि कई छात्र अपने टेक्स्ट प्रोसीजर बनाते हैं।प्राइसिंग प्रोसीजर की अवधारणा ⏱ 545:18
•प्राइसिंग प्रोसीजर का अर्थ विभिन्न कंडीशन्स (जैसे ग्रॉस प्राइस, डिस्काउंट, फ्रेट, टैक्स) को एक ऑर्डर में निर्धारित करना है।•उदाहरण: एक पीओ में ड्राई जेंजर के लिए मैक्सिमम क्वांटिटी 5 डजन थी, लेकिन 100 डजन मंगाए गए, जो गलती थी।•ये कंडीशन्स सिस्टम में कॉन्फ़िगर की जाती हैं और इसे ही प्राइसिंग प्रोसीजर कहते हैं।कंडीशन टेबल और एक्सेस सीक्वेंस ⏱ 549:26
•- प्राइसिंग प्रोसीजर बनाने के लिए दो मुख्य चीजें आवश्यक हैं: कंडीशन टेबल और एक्सेस सीक्वेंस।•- कंडीशन टेबल: 01 से 499 तक के नंबर एसपी के हैं, 500 से 999 तक अपने लिए लेना है। टेबल में फील्ड्स (जैसे वेंडर, प्लांट, मटेरियल ग्रुप) चुननी होती हैं।•- एक्सेस सीक्वेंस: कंडीशन टेबल को इसमें ऐड करना होता है, और नंबर हमेशा 10 ही लेना होता है (1,2,3 नहीं)। इसे ब्लैंक छोड़ने पर प्राइसिंग के लिए, 1 डालने पर रिबेट के लिए।•- एक्सेस सीक्वेंस को सेव करने के बाद फील्ड्स की स्थिति ग्रीन होनी चाहिए।कंडीशन टाइप और प्राइसिंग प्रोसीजर ⏱ 561:30
•ग्रॉस प्राइस SAP स्टैंडर्ड है (कोड 2), लेकिन किसी ने अपना एक्सेस सीक्वेंस (A69 962) इस्तेमाल किया है।•कंडीशन कैटेगरी: B (प्राइसिंग), कैलकुलेशन टाइप: क्वांटिटी के हिसाब से।•राउंडिंग रूल: ब्लैंक = कमर्शियल (नियरेस्ट), राउंड अप/डाउन विकल्प भी हैं।•ग्रुप कंडीशन में हेडर/आइटम कंडीशन में बदलाव की अनुमति, मैनुअल एंट्री के लिए 'नो लिमिटेशन' सबसे अच्छा।•डिस्काउंट/फ्रेट के लिए पॉजिटिव/नेगेटिव चुनें (डिस्काउंट नेगेटिव, फ्रेट पॉजिटिव)।कंडीशन टाइप्स की विविधता और प्राइसिंग प्रोसीजर सेटअप ⏱ 567:09
•डिस्काउंट टाइप: फिक्स (जैसे ₹1000) और परसेंट (जैसे 1%) दोनों बनाए जा सकते हैं; क्वांटिटी, ग्रॉस वेट, नेट वेट पर भी डिस्काउंट संभव।•फ्रेट चार्ज: परिवहन लागत, जैसे Amazon का डिलीवरी चार्ज; फिक्स या वेट के आधार पर।•प्राइसिंग प्रोसीजर (स्कीमा) में स्टेप नंबर सेम कंडीशन टाइप के लिए समान रहते हैं; बेसिक प्राइस 100, डिस्काउंट 200, फ्रेट 400, कस्टम ड्यूटी 500।•कैलकुलेशन: परसेंट वाले कंडीशन के लिए बेस अमाउंट (जैसे 100) निर्दिष्ट करें, फिक्स के लिए कोई ज़रूरत नहीं।•उदाहरण: 1% डिस्काउंट पर ₹12000 का 1% = ₹120; नेट वैल्यू = बेस - डिस्काउंट, टोटल = सभी पॉजिटिव अमाउंट्स का योग।•फ्रेट और कस्टम ड्यूटी: सामान मंगाने पर डिलीवरी चार्ज और फ्रेट कॉस्ट लगती है। बाहर से सामान आने पर कस्टम ड्यूटी देनी पड़ती है। अलीबाबा से सामान मंगाने पर पहले गिफ्ट ऑप्शन से ड्यूटी नहीं लगती थी, लेकिन अब सरकार ने पकड़ लिया।•कंडीशन टाइप: मैनुअल, रिक्वायर्ड, स्टैटिस्टिक्स। रिक्वायर्ड चुनने पर डिस्काउंट देना अनिवार्य है। अनटिक रखने पर ऑटोमैटिक नहीं होगा।•प्रिंटिंग कोड: x (आइटम लेवल) और s (टोटल लेवल) — इन्हीं दो कोड का उपयोग होता है। नाइन (9) का मतलब कॉपी वैल्यू ऑफ कंपेयर टू ग्रॉस वैल्यू, जो टोटल में जोड़ा जाता है।•कैलकुलेशन: सिंपल कैलकुलेशन के लिए 100 और 200 डालकर नेट वैल्यू निकाली। कस्टम कैलकुलेशन के लिए फॉर्मूला बनाकर लगा सकते हैं। एक बार में एक ही कैलकुलेशन यूज़ होगा।•अकाउंट असाइनमेंट: डिस्काउंट, फ्रेट, कस्टम ड्यूटी के लिए जीएल (GL) लगाना होता है। उदाहरण में डिस्काउंट के आगे GL लगाकर और TAR1 GL असाइन करके रिपोर्ट निकाली। जीएल में सारी एंट्री आ जाती है और उसी से रिपोर्ट बनती है।•स्कीमा ग्रुप: वेंडर स्कीमा ग्रुप (13) और परचेस ऑर्गेनाइजेशन स्कीमा ग्रुप (103) बनाया। इन्हें असाइन करने के बाद प्राइसिंग प्रोसीजर से कनेक्ट किया। तारा के लिए 13 और 103 असाइन किए, अंजन के लिए 92।•डिफाइन स्कीमा डिटरमिनेशन: यहां 103 (परचेस ऑर्ग), 13 (वेंडर), और प्राइसिंग प्रोसीजर तीनों कनेक्ट होते हैं। अंत में वेंडर में जाकर स्कीमा ग्रुप 13 असाइन किया।•अगला टॉपिक: MM to FI इंटीग्रेशन, ऑटोमेटिक पोस्टिंग, रिपोर्ट। डिस्काउंट के आगे जीएल लगाने की पूरी प्रक्रिया वहां विस्तार से होगी।•मॉक इंटरव्यू का उदाहरण: फिजिकल इन्वेंटरी स्टॉक डिस्क्रेपेंसी और अर्जेंट मटेरियल रिक्वायरमेंट जैसे सवाल पूछे जाते हैं। टॉपिक याद रखना जरूरी है, सिर्फ कॉन्फिगरेशन नहीं। एक लड़की का उदाहरण दिया जो टॉपिक भूल गई थी।वेंडर और कस्टमर मास्टर डेटा प्रक्रिया का सारांश ⏱ 601:33
•वेंडर और कस्टमर मास्टर डेटा बनाने की प्रक्रिया में पार्टनर फंक्शन सबसे महत्वपूर्ण है; इसे ठीक से समझना आवश्यक है।•वेंडर क्रिएट करने के लिए OBD2 का उपयोग नहीं करना है; बल्कि XD01 टी-कोड का उपयोग करना है। पार्टनर फंक्शन (सोल टू पार्टी, शिप टू पार्टी, बिल टू पार्टी, पेयर) को सही तरीके से कॉन्फ़िगर करना होता है।•पार्टनर डिटरमिनेशन प्रोसेस (VOPAN) में पांच चरण होते हैं: डिफाइन पार्टनर डिटरमिनेशन प्रोसेस, पार्टनर फंक्शन इन प्रोसीजर, पार्टनर डिटरमिनेशन असाइनमेंट, अकाउंट ग्रुप फंक्शन असाइनमेंट, और रिकंसिलेशन अकाउंट (FS00)।•रिकंसिलेशन अकाउंट कस्टमर के लिए भी बनाना होता है, जिसमें कंट्रोल डेटा में वेंडर की जगह कस्टमर चुनना होता है; बाकी प्रक्रिया वेंडर की तरह ही है।वेंडर/कस्टमर मास्टर और कंडीशन टेबल सेटअप ⏱ 621:35
•वेंडर टाइप XD01 में बनाया जा सकता है, दोनों अकाउंट ग्रुप (OBY2 और OBT0 से) दिखेंगे, पर सोल टू पार्टिसिपेट वहां काम नहीं करता।•कंडीशन टेबल: 500 से ऊपर नंबर लें, उदाहरण 966-969 फ्री नहीं, 974 लिया (टेबल 745 पहले से थी)। फील्ड्स: मटेरियल, प्लांट, मटेरियल ग्रुप ले सकते हैं।•टेबल जनरेट की, लोकल ऑब्जेक्ट में सेव किया (पैकेज नहीं होने से ट्रांसपोर्ट नहीं होगा)।•एक्सेस सीक्वेंस: A974 टेबल, एक्सेस सीक्वेंस A974 (नंबर 10) बनाया।कंडीशन टाइप्स और प्राइसिंग प्रोसीजर ⏱ 624:23
•कंडीशन टाइप्स: PB00 से कॉपी कर बनाए – SGRS (ग्रॉस प्राइस), DICS (फिक्स डिस्काउंट, नेगेटिव), SDCP (परसेंट डिस्काउंट, नेगेटिव), SFRF (फ्रेट, फिक्स अमाउंट, पॉजिटिव), SCUT (कस्टम ड्यूटी, फिक्स/परसेंट, पॉजिटिव)।•प्राइसिंग प्रोसीजर: सोहेल प्रोसीजर बनाया, स्टेप्स: 100 (SGRS), 200 (DICS), 300 (SDCP), फिर 400 फ्रेट, 500 कस्टम, 600 टोटल वैल्यू। कैलकुलेशन: 100 में बेसिक, 200 में डिस्काउंट, 300 में नेट, आगे फ्रेट/कस्टम।•इंडिया में इंपोर्ट ड्यूटी: फिनिश गुड (जैसे गाड़ियां) पर 100% इंपोर्ट ड्यूटी, मेक इन इंडिया के तहत।फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और कर प्रभाव ⏱ 641:36
•फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद पहले 100% टैक्स अब 10% होगा, जिससे बाहर से आयातित गाड़ियाँ भारत में सस्ती होंगी।•भारत का यूरोपीय संघ और यूएस के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट नहीं है, लेकिन यूके के साथ हुआ है, जिससे भारत भी वहाँ अपना सामान बेच सकता है।गणना विधि और खाता असाइनमेंट ⏱ 642:37
•कुल मूल्य की गणना 500 (300+400+500) के रूप में होगी, और तीनों विकल्पों में से आइटम लेवल प्रिंट क्ले चुनना है, जिसमें कैपिटल S आएगा।•डिस्काउंट के लिए GL 'DIS', फ्रेट के लिए 'FR1', कस्टम के लिए 'FR3' लगाने से MFI इंटीग्रेशन होगा।•वेंडर ग्रुप के लिए कोड 16 और स्कीमा ग्रुप 106 असाइन करें; इंटरवल OS A02 के साथ 106-106 कनेक्ट करें।•इन असाइनमेंट के बाद वेंडर को 16 नंबर असाइन करें और XK2 वेंडर के लिए N XK चुनें।पार्टनर डिटरमिनेशन और कस्टमर सेटअप ⏱ 660:56
•पार्टनर डिटरमिनेशन प्रोसेस के लिए स्टैंडर्ड AG को कॉपी करके 'S AG' नाम से नया बनाएं, और कस्टमर मास्टर में नंबर रेंज 01 से 4 तक बनाएं।•कस्टमर के लिए S01 और S02 अकाउंट ग्रुप बनाएं, जिसमें S01 में 01 नंबर रेंज असाइन होगी।•कस्टमर पेमेंट टर्म के लिए OBB A में न्यू एंट्री करें, पेमेंट 20 दिन, डेली 20 डेज़, कस्टमर के लिए 'SO H3' चुनें, और डिस्काउंट नहीं देना है।•कस्टमर नंबर 31 या 900 से बनाएं, पहले 18 था, अब 31 है।MM-फाई इंटीग्रेशन और ऑटोमेटिक पोस्टिंग का कॉन्सेप्ट ⏱ 662:49
•एमएम-फाई इंटीग्रेशन का मतलब ऑटोमेटिक पोस्टिंग है, जिसमें सिस्टम खुद से कई जगह पोस्टिंग करता है।•पीओ में ग्रॉस प्राइस, डिस्काउंट, टैक्स जैसी चीजें होती हैं; उन्हें अलग-अलग जीएल में ऑटोमेटिक पोस्ट करने से रिपोर्टिंग आसान हो जाती है (जैसे कस्टम ड्यूटी या फ्रेट की रिपोर्ट)।•ऑटोमेटिक पोस्टिंग के लिए सबसे पहले वैल्यूएशन ग्रुपिंग डिफाइन करनी होती है, जिसमें प्लांट वाइज़ या सभी प्लांट को एक साथ ग्रुप किया जा सकता है।वैल्यूएशन क्लास और अकाउंट कैटेगरी रेफरेंस की कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 666:08
•स्टेप 1: वैल्यूएशन एरिया ग्रुपिंग - दोनों प्लांट (SOH2) को एक ग्रुप में बांधा गया, ग्रुप कोड 8888 लिया गया।•स्टेप 2: अकाउंट कैटेगरी रेफरेंस - सिंपल सिनेरियो में एक ही कैटेगरी (जैसे 'ट्रिपल 1') बनाई जा सकती है, या अलग-अलग (रॉ, सेमी-फिनिश, फिनिश) के लिए अलग-अलग बनाई जा सकती हैं। यहाँ सिंपल वाला बनाया गया।•स्टेप 3: वैल्यूएशन क्लास - तीन क्लास बनाई गईं (जैसे 888, 889, 890) और उन्हें कैटेगरी से कनेक्ट किया गया।•मटेरियल टाइप के साथ असाइनमेंट किया गया; SOH1 और SOH3 में अकाउंटिंग में वैल्यूएशन क्लास बदली गई।जीएल निर्माण और असाइनमेंट प्रक्रिया ⏱ 681:48
•इस सेगमेंट में, वक्ता जीएल (खाता) बनाने की प्रक्रिया समझाते हैं, जो फाइनेंस कंसल्टेंट द्वारा बनाए जाते हैं।•एसेट से जीएल बनाने के लिए, ओबीडी4 मेनू में अकाउंट डिफाइन अकाउंट ग्रुप से नंबर कॉपी करते हैं। कंपनी कोड एसओ एच वन के लिए जीएल बनाते हैं, जहां 4000 से पहले से एक जीरो बना है, इसलिए 401 लेते हैं। बैलेंस शीट अकाउंट एसेट्स में जीएल बनाते हैं।•समय बचाने के लिए, वक्ता प्रत्येक गतिविधि के लिए एक जीएल बनाते हैं, जबकि वास्तव में तीन-तीन (रॉ, सेमी-फिनिश, फिनिश) बनाने होते हैं। उदाहरण के लिए, इन्वेंटरी पोस्टिंग के लिए तीन जीएल बनाए जाते हैं: इन्वेंटरी पोस्टिंग वन, टू, और थ्री (जिन्हें वे 1, 2, 3 नंबर देते हैं)। चेंज इन स्टॉक अकाउंट के लिए भी अलग जीएल बनाते हैं।•फ्राइट क्लियरिंग, कस्टम क्लियरिंग, डिस्काउंट (जिसके लिए कोई कैटेगरी नहीं है, इसलिए जनरल जीएल का उपयोग करते हैं), ऑफसेट इन्वेंटरी (बिना पीओ के स्टॉक डालने के लिए), वेंडर कंसाइनमेंट, और जीआर/आईआर क्लियरिंग अकाउंट के लिए भी जीएल बनाते हैं।•जीएल बनाने के बाद, उन्हें वैल्यूएशन क्लासेस (जैसे 888, 889, 8890) के साथ असाइन करते हैं। इन्वेंटरी पोस्टिंग वन में तीनों क्लासेस के लिए अलग-अलग जीएल असाइन करते हैं, इन्वेंटरी पोस्टिंग टू में एक ही जीएल, और स्टॉक चेंज में भी।•वक्ता बताते हैं कि जब भी पीओ बनाया जाएगा, सिस्टम प्लांट और वैल्यूएशन क्लास के आधार पर स्वचालित रूप से जीएल में पोस्टिंग करेगा, जिससे रिपोर्ट निकालना आसान होगा।त्रुटियाँ और अगले चरण ⏱ 681:48
•वक्ता जानबूझकर कुछ जीएल नहीं बनाते (जैसे एक्सटर्नल एक्टिविटी के लिए) ताकि प्रक्रिया में त्रुटियाँ आएं और उन्हें ठीक करना सीखा जा सके। जब त्रुटियाँ आएंगी, तब वे जीएल बनाएंगे।•वे बताते हैं कि कुछ जीएल पहले से बने होते हैं (जैसे इनपुट टैक्स, आउटपुट टैक्स) जिन्हें बनाने की आवश्यकता नहीं है।•वे कहते हैं कि एस/4HANA सॉफ्टवेयर रिपोर्टिंग के लिए है, और सही जीएल असाइनमेंट के बिना रिपोर्ट नहीं निकाली जा सकती।•अंत में, वे पी2पी प्रक्रिया (स्टैंडर्ड पीओ) शुरू करने की बात करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों आज ही करा दिए क्योंकि वे अगले दिन उपलब्ध नहीं होंगे।P2P चक्र और कॉन्फ़िगरेशन ⏱ 701:50
•P2P चक्र में मानक चरण: परचेस पोजीशन, परचेस रिक्वजीशन, RFQ, मेंटेन RFQ, कंपेयर RFQ, परचेस ऑर्डर, GRN, इनवॉइस रिसीप्ट नोट, इनकमिंग इनवॉइस, आउटगोइंग पेमेंट। टी-कोड: ME51N, ME41, ME47, ME49, ME21N, F-60, F-53।•परचेस रिक्वजीशन सीधे बनाना आवश्यक नहीं है; P2P चक्र को छोड़ा जा सकता है। MRP रन (MD02) से स्वचालित रूप से PR/PO बन सकता है जब मटेरियल निर्धारित सीमा से नीचे हो (उदा. टायर 1000 से नीचे)।•अन्य विकल्प: कॉन्ट्रैक्ट या कोटेशन के आधार पर PO बनाना; PR में 'सोर्स लिस्ट' से वेंडर चुनना। संगठन की आवश्यकता के अनुसार स्टेप अलग हो सकते हैं।व्यावहारिक कार्य: रिक्वजीशन, कोटेशन, और एरर ⏱ 709:34
•ME51N में मटेरियल (SOA-2, रॉ मटेरियल), मात्रा 12 पीस, डिलीवरी डेट 3 जून, प्लांट SOH1, वेंडर सोहेल मोटर इंडिया। PR नंबर बनाया गया।•दूसरा वेंडर XK01 से बनाया: JBL (हारमन का), और MRF। दोनों के लिए परचेस इन्फो रिकॉर्ड (ME11) बनाना आवश्यक।•ME41 में RFQ बनाया: डेडलाइन 04.06.2025, परचेस ग्रुप SOA। PR-51 से कोटेशन कॉपी किया, वेंडर चयन: MRF (104) और JBL (105)। त्रुटि आई 'Document type not allowed', टोकन नंबर और डॉक्यूमेंट प्रकार ठीक किया।•ME40 में कोटेशन दर्ज: MRF से 3200 प्रति दर्जन, डिस्काउंट 10%, फ्रेट 10000। त्रुटि 'Tolerance limit' आई, जिसे SOH1 में 'Do not check' से ठीक किया। कीमत विचरण का कारण समझाया।मूल्य सहिष्णुता और त्रुटियों का समाधान ⏱ 721:51
•कीमत सहिष्णुता (price tolerance) के लिए ऊपरी और निचली सीमा (10% ऊपर/नीचे) तय की जाती है; यदि वास्तविक मूल्य इस सीमा के भीतर है तो प्रक्रिया आगे बढ़ती है, अन्यथा त्रुटि आती है।•पहला त्रुटि (एरर नंबर 1) दर्ज किया गया, जिसे सुधारने के बाद सामान्य प्रक्रिया आगे बढ़ी।•जेबीएल और एमआरएफ के लिए कोटेशन की तुलना की गई; एमआरएफ 3100 रुपये में उपलब्ध था, जबकि जेबीएल 357000 रुपये दिखा (बाद में 31000 रुपये पर सही हुआ)।•गुड रिसीव के दौरान त्रुटि नंबर 2 (169P) आई, जिसे SOA1 कंपनी कोड से हल किया गया।महीने के अंत की गतिविधियाँ और अन्य त्रुटियाँ ⏱ 735:14
•त्रुटि नंबर 3: पोस्टिंग केवल अप्रैल और मई (अवधि 1 और 2) में संभव है, जून (अवधि 3) बंद है; इसे MM PB ट्रांजेक्शन कोड से खोला गया।•त्रुटि नंबर 4: VP टॉलरेंस लिमिट (मूविंग एवरेज प्राइस) को ठीक करना आवश्यक।•त्रुटि नंबर 5: GL पोस्टिंग को पोस्ट टेबल से सीधे पोस्ट करने के लिए बदला गया।•त्रुटि नंबर 6: RF बैलेक (फाइनेंस डॉक्यूमेंट) के लिए नंबर रेंज का अभाव; इसे FBN1 ट्रांजेक्शन कोड से हल किया गया।पी2बी प्रक्रिया में आने वाली समस्याएं और समाधान ⏱ 741:53
•एफबीएन1 में कंपनी कोड 99 और रेंज सेट करके नंबर रेंज एरर (51, 50, 49) हल करें।•ऑर्डर रिसीव करने के बाद अमाउंट डालना अनिवार्य है; नहीं डालने पर डिस्काउंट एरर आता है।•SM30 में यूजर को ग्रुप असाइन करने के लिए T43 में जाकर पहले ग्रुप बनाएं (अमाउंट लिमिट सेट करें), फिर असाइन करें; अपनी आईडी के लिए ग्रुप ब्लैंक रखें ताकि सभी कंपनियों में काम करे।•टैक्स डिटरमिनेशन के लिए फाइनेंस कॉन्फिगरेशन करें: FSPRO में टैक्स कोड के लिए GL बनाएं (इनपुट/आउटपुट), टैक्स अकाउंट असाइन करें, और NR (NSPRO) में 169V एरर के लिए 0% टैक्स कैटेगरी का GL लगाएं।•GR/IR क्लियरिंग GL में टैक्स कैटेगरी में 'ऑल टैक्स टाइप अलाउड' (स्टार, न्यू, ओल्ड) सेट करें।कंडीशन टेबल और एक्सेस सीक्वेंस में समस्या ⏱ 761:53
•टी-कोड VOK0 से प्राइसिंग कंडीशन टेबल तक पहुंचे, पाथ: SPRO → सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन → बेसिक फंक्शन्स → प्राइसिंग → प्राइसिंग कंट्रोल → कंडीशन टेबल्स।•नई कंडीशन टेबल 932 बनाई, फील्ड्स कस्टमर, डिस्ट्रीब्यूशन चैनल और मटेरियल चुनीं, लेकिन प्लांट फील्ड में त्रुटि आई, जिसे शिफ्ट पार्टनरशिप से बदलकर काम चलाया और लोकल ऑब्जेक्ट जनरेट किया।•एक्सेस सीक्वेंस में नई एंट्री नंबर 1 बनाई, लेकिन फील्ड में गलत कस्टमर दिखा; फिर से कंडीशन टेबल में डिलीट/चेंज विकल्प नहीं मिला, इसलिए उसे वैसे ही छोड़ दिया।•बाद में सही कस्टमर फील्ड (ऊपर वाला) चुनकर एक्सेस सीक्वेंस दोबारा बनाने की कोशिश की, लेकिन अगले फील्ड में बिना ड्रैग के चेंज संभव नहीं था, इसलिए मीटिंग समाप्त होने के कारण अगले सत्र में जारी रखने की बात कही।मुख्य बिंदु
•एसएपी एबीएपी कंसल्टेंट की भूमिका क्लाइंट फेसिंग नहीं होती, बल्कि वे कस्टम टेबल, फील्ड्स, क्वेरीज और रिपोर्ट्स बनाते हैं।•एंटरप्राइज स्ट्रक्चर में कंपनी, कंपनी कोड, प्लांट, स्टोरेज लोकेशन, और परचेस ऑर्गेनाइजेशन शामिल होते हैं, जिन्हें विभिन्न टी-कोड्स (जैसे OX10) से बनाया जाता है।•फिस्कल ईयर हर देश में अलग होता है (भारत में अप्रैल से मार्च) और पोस्टिंग पीरियड्स को तय करता है।•चार्ट ऑफ अकाउंट्स फाइनेंस कॉन्फ़िगरेशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, और हाना में फाइनेंस और कंट्रोलिंग के लिए अलग जीएल अकाउंट बनाने पड़ते हैं।•मटेरियल मास्टर बनाते समय मटेरियल टाइप, नंबर रेंज, और प्लांट के लिए वैल्यूएशन सेटिंग्स की आवश्यकता होती है।•पी2पी चक्र में परचेस रिक्वजीशन, आरएफक्यू, कोटेशन तुलना, परचेस ऑर्डर, जीआरएन, इनवॉइस, और भुगतान शामिल हैं, और इस दौरान आने वाली त्रुटियों को कॉन्फ़िगरेशन के माध्यम से हल किया जाता है।निष्कर्ष
वीडियो में एसएपी एमएम मॉड्यूल के विभिन्न पहलुओं को कवर किया गया, जिसमें एंटरप्राइज स्ट्रक्चर से लेकर प्राइसिंग प्रोसीजर और पी2पी चक्र तक शामिल है। प्रशिक्षक ने प्रैक्टिकल उदाहरणों के माध्यम से कॉन्फ़िगरेशन और त्रुटि समाधान की प्रक्रिया समझाई।